कितने रूह बनाओगे तुम
कितने रूप सजाओगे
कितने लब्ज़ उकेरोगे तुम
कितने गीत बनाओगे
कितनो के तुम साथ रहोगे
कितनो से होगे तुम दुर
कितनो संघ बदनाम रहोगे
कितनो संघ होगें मजबूर
कितनो का मन शीतल करके
खुद मे आग लगाओगे
कितनो का तुम ह्रदय सजाकर
खुद को यूं तड़पाओगे
सदियों से तुम इसी खेल से
जग बहलाते आए हो
अपने मन के उद्गार झील मे
कमल खिलाते आए हो
हे कवि फिर भी यह जग
तेरा दर्द समझ ना पाएगा
तू पीड़ा लेकर आया था
तू पीड़ा लेकर जाएगा
सांवरे
कितने रूप सजाओगे
कितने लब्ज़ उकेरोगे तुम
कितने गीत बनाओगे
कितनो के तुम साथ रहोगे
कितनो से होगे तुम दुर
कितनो संघ बदनाम रहोगे
कितनो संघ होगें मजबूर
कितनो का मन शीतल करके
खुद मे आग लगाओगे
कितनो का तुम ह्रदय सजाकर
खुद को यूं तड़पाओगे
सदियों से तुम इसी खेल से
जग बहलाते आए हो
अपने मन के उद्गार झील मे
कमल खिलाते आए हो
हे कवि फिर भी यह जग
तेरा दर्द समझ ना पाएगा
तू पीड़ा लेकर आया था
तू पीड़ा लेकर जाएगा
सांवरे